अस्थमा के मरीजों के लिए डाइट प्लान- क्या खाएं और क्या न खाएं

अस्थमा ऐसी बीमारी हैं जिसमें पीड़ित व्यक्ति को सांस लेने में समस्या होती है। अस्थमा में सांस लेने की नली तंग हो जाती है और इसी वजह से सांस लेने में परेशानी होती है। अस्थमा का इलाज संभव है, लेकिन इसके रोगी को बहुत अधिक ध्यान रखना पड़ता है। खासतौर पर अपने खाने-पीने का। अस्थमा से पीड़ित व्यक्ति को अस्थमा डाइट प्लान के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। क्योंकि, इससे वो इस समस्या से कुछ हद तक राहत पा सकते हैं। जानिए अस्थमा में आपको क्या खाना चाहिए और क्या नहीं। पाइये अस्थमा डाइट प्लान की पूरी जानकारी।

अस्थमा में क्या खाएं

अस्थमा डाइट प्लान से पहले जानें अस्थमा में कौन-कौन से खाद्य पदार्थ खाने चाहिए।

इस बात के पर्याप्त सुबूत मौजूद हैं कि विटामिन C और E, बीटा कैरोटीन, फ्लैवोनॉइडस, मैग्नीशियम, सेलेनियम और ओमेगा-3 फैटी एसिडस युक्त खाद्य पदार्थ खाने से अस्थमा के होने की संभावना कम हो जाती है।

विटामिन C :  विटामिन C युक्त खाद्य पदार्थ हैं खट्टे फल, हरी पत्तेदार सब्जियां, कीवी, ब्रोकली, टमाटर, मटर आदि।

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विटामिन E युक्त आहार : विटामिन E युक्त आहार जैसे पालक, आम,बादाम, मूंगफली, पीनट बटर, सूरजमुखी के बीज आदि।

बीटा कैरोटीन युक्त आहार : बीटा कैरोटीन युक्त खाद्य पदार्थ जैसे गाजर, रेड पेपर , हरी पत्तेदार सब्जियां, सूखे खुबानी, शकरकंदी आदि।

ओमेगा-3 फूड्स : ओमेगा-3 फूड्स जैसे सालमोन मछली, टूना मछली, अलसी के बीज आदि।

फ्लेवोनॉइडस : फ्लेवोनॉइडस ग्रीन और ब्लैक टी, सेब, प्याज,  सलाद, टमाटर, बीन्स, शकरकंद और क्विनोआ आदि में पाए जाते हैं।

विटामिन D : लोग जिन्हें अस्थमा होता है, उनका विटामिन D का लेवल कम होता है। इसलिए इस लेवल को सही रखने के लिए इसकी पर्याप्त मात्रा लेना आवश्यक है।

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अस्थमा में ऐसे भोजन या खाद्य पदार्थों से दूर रहें, जिसमें सल्फाइट की मात्रा हो। सल्फाइट एक केमिकल होता है जो कुछ खाद्य पदार्थों में होता है। यह एक खाद्य परिरक्षक के रूप में कार्य करता है। इससे अस्थमा की समस्या बढ़ती है और लक्षण गंभीर हो सकते हैं। सल्फाइट वाइन, सूखे मेवे, अचार, प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों, सूखे फल, डिब्बाबंद सब्जियां और मसालों आदि में पाया जाता है। इसके साथ ही यह कुछ सब्जियों जैसे प्याज में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। कॉर्न स्ट्रेच या सोया में भी होता है।

सल्फाइट्स कई नामों से खाद्य पदार्थों में पाया जाता है जैसे सल्फर डाइऑक्साइड, सोडियम सल्फाइट, सोडियम मेटाबिसल्फाइट, पोटेशियम बिसल्फाइट और पोटेशियम मेटाबिसल्फाइट। हालांकि, अस्थमा से पीड़ित सभी लोग सल्फाइट के साइड इफेक्टस को अनुभव नहीं करेंगे। यदि आप सल्फाइट वाले खाद्य पदार्थों के प्रति संवेदनशील महसूस करते हैं, तो एक डायरी में नोट करें और उन खाद्य पदार्थों से बचें, जिनमें सल्फाइट होते हैं। अगर सल्फाइट युक्त आहार का आप सेवन करें, तो थोड़ा ध्यान रखें। हो सके तो ऐसे खाद्य पदार्थों को अस्थमा डाइट प्लान में शामिल न करें।

क्या न खाएं

अस्थमा डाइट प्लान से पहले आपका यह जानना भी आवश्यक है कि आपको इसमें क्या नहीं खाना चाहिए। जानें क्या न खाएं अस्थमा होने पर:

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शिशु के विकास में देरी होने पर इसका इलाज कैसे किया जाता है? 

बच्चे का ट्रीटमेंट उस कारण पर निर्भर करता है जिसकी वहज से विकास में देरी हो रही है। अगर विकास में देरी का कारण फैमिली हिस्ट्री या कॉन्स्टिट्यूशनल डिले (constitutional delay) है तो डॉक्टर सामान्यत: कोई ट्रीटमेंट रिकमंड नहीं करते। दूसरे कारणों के आधार पर निम्न ट्रीटमेंट शुरू किए जा सकते हैं।

ग्रोथ हॉर्मोन डिफेशिएंसी होने पर 

अगर आपके बच्चे में ग्रोथ हॉर्मोन डेफिशिएंसी है तो डॉक्टर जीएच का इंजेक्शन दे सकता है। इंजेक्शन घर में पेरेंट्स के द्वारा दिन में एक बार दिया जाता है। यह इंजेक्शन कई वर्षों तक दिया जाता है जब तक बच्चे का विकास जारी रहता है। डॉक्टर ट्रीटमेंट के प्रभाव पर नजर रखते हैं और उसके अनुसार डोज को घटाते या बढ़ाते हैं।

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हायपोथायरॉडिज्म के कारण शिशु के विकास में देरी होने पर 

शिशु के लिए डॉक्टर थायरॉइड हॉर्मोन रिप्लेसमेंट ड्रग्स देते हैं जो कि शिशु के अंडरएक्टिव थायरॉइड ग्लैंड के साथ कंपनसेट करते हैं। ट्रीटमेंट के दौरान डॉक्टर शिशु के हॉर्मोन लेवल को रेगुलरली मॉनिटर करते हैं। कुछ बच्चे इस डिसऑर्डर से कुछ समय में ओवरकम कर लेते हैं, लेकिन कुछ बच्चों को जीवनभर ये ट्रीटमेंट लेना पड़ता है।

टर्नर सिंड्रोम के कारण शिशु के विकास में देरी होने पर 

टर्नर सिंड्रोम होने पर भी शिशुओं में ग्रोथ हॉर्मोन का प्रोडक्शन नैचुरली होता है, लेकिन इंजेक्शन के जरिए जीएच दिए जाने पर बॉडी इसका उपयोग अधिक प्रभावी ढंग से करती है। 4-6 साल तक के बच्चे को डॉक्टर रोज एक इंजेक्शन देने की सलाह दे सकते हैं ताकि वह व्यस्क होने तक सामान्य हाइट तक पहुंच जाएं।

इसके अलावा भी कई अन्य कारण हो सकते हैं जो कि शिशु के विकास में देरी के लिए जिम्मेदार हो। उनके आधार पर डॉक्टर ट्रीटमेंट सजेस्ट करते हैं। अधिक जानकारी के लिए डॉक्टर से बात करें। चूंकि अर्ली ट्रीटमेंट आपके बच्चे को नॉर्मल हाइट तक पहुंचाने में मदद कर सकता है। इसलिए अगर शिशु में डिलेड ग्रोथ के लक्षण नजर आते हैं तो जल्द से जल्द डॉक्टर से संपर्क करें।

उम्मीद करते हैं कि आपको यह आर्टिकल पसंद आया होगा और शिशु के विकास में देरी से संबंधित जरूरी जानकारियां मिल गई होंगी। अधिक जानकारी के लिए एक्सपर्ट से सलाह जरूर लें। अगर आपके मन में अन्य कोई सवाल हैं तो आप हमारे फेसबुक पेज पर पूछ सकते हैं। हम आपके सभी सवालों के जवाब आपको कमेंट बॉक्स में देने की पूरी कोशिश करेंगे। अपने करीबियों को इस जानकारी से अवगत कराने के लिए आप ये आर्टिकल जरूर शेयर करें।

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