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भारत मधुमेह की विश्व राजधानी

By on September 28, 2015

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मधुमेह कोई जानलेवा रोग नहीं है। इसके बावजूद इसका इतना अधिक आतंक इसलिए है, क्योंकि यह अपने साथ ऐसे बहुत से रोगों को लेकर आता है जो जीना मुहाल कर दिया करते हैं और कभी-कभी जानलेवा भी साबित होते हैं। मधुमेह बचपन में भी हो सकता है, लेकिन अक्सर ही इसका कहर 40 साल की आयु के बाद टूटता है।

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मधुमेह का सबसे अधिक असर गुर्दे एवं आंखों पर पड़ता है। विशेष रूप से दृष्टि से संबंधित रोगों से ग्रस्त लोगों को अगर मधुमेह हो जाए तो फिर खतरा बहुत बढ़ जाता है। डायबिटिक रेटीनोपैथी ऐसी ही एक बीमारी है जो इंसान को अंधा भी कर सकती है। सेंटर फॉर साइट के चेयरमैन डा. महिपाल एस. सचदेव का कहना है कि डायबिटिक रेटिनोपैथी एक ऐसा रोग है जो अक्सर ही बिना किसी तरह का संकेत दिए, आंखों पर हमला करता है। यह आंखों के रेटिना को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाना है। रक्त वाहिकाओं से रिसाव होने लगता है, रेटिना में सूजन आ जाती है या फिर उनमें ब्रश जैसे निशान पड़ जाते हैं।

एक बार अगर डायबिटिक रेटिनोपैथी का हमला हो जाए तो रेटिना को आक्सीजन एवं अन्य पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं। परिणाम यह होता है कि पहले दृष्टि धुंधल पड़ने लगती है और उसके बाद जैस-जैसे समय बीतता जाता है कई तरह की समस्याएं सामने अपने लगती हैं। देखने में दिक्कत तो होती ही है, ब्लाइंट स्पॉट, फ्लोट भी नजर आने लगते हैं। अगर रोग का इलाज न कराया जाए तो अंधापन भी आ सकता है। चूंकि इस रोग के शुरुआती लक्षण समझ में नहीं आते और जब तक मरीज को यह एहसास होता है कि समस्या पैदा हो रहा है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। ऐसे में यह जरूरी है कि अगर आपको मधुमेह है तो रक्त और पेशाब के अलावा आंखों की भी नियमित रूप से जांच करवाते रहना चाहिए। अगर मधुमेह नियंत्रण में रहेगा तब डायबिटिक रेटिनोपैथी का खतरा भी कम होगा। यह नहीं आंखों को डायबिटीज से बचाने का एक मात्र उपाय यही है कि उनकी नियमित जांच हो जिसे अगर कोई रोग हमला करने की तैयारी कर रहा तो उसका पता लगाकर इलाज करवाया जा सके।

डायबिटिक रैटिनोपैथी रेटिना से संबंधित माइक्रोवैस्कुलर परिवर्तनों का परिणाम होती है। जैसे-जैसे रोग बढ़ता जाता है, गंभीर नॉन प्रॉलिफरेटिव डायबिटिक रेटिनोपैथी विकसित स्तर पर पहुंच जाती है जहां रक्त नलिकाओं का आकार बढ़ने लगता है। रेटिना के साथ-साथ नयी रक्त नलिकाएं बढ़ने के कारण आंखों के भीतरी हिस्से में जेल जैसा विट्रियस ह्यूमर भरने लगता है। अगर समय पर इलाज न हो तब यही नयी रक्त नलिकाएं रिसने लगती हैं, दृष्टि धुंधला जाती है तथा रेटिना नष्ट हो जाती है। फाइब्रोवैस्कुलर प्रोलिफरेशन के कारण रेटिना डिटैचमेंट की संभावना बन सकती है। नई रक्त नलिकाओं के कारण नियोवैस्कुलर ग्लूकोमा भी हो सकता है। डायबिटिक रैटिनोपैथी का तीन तरह से प्रभावशाली इलाज किया जा सकता है। वास्तविकता यह है कि रेटिना के पूरी तरह नष्ट हो जाने के पहले अगर इलाज शुरू हो जाए तो 90 प्रतिशत लोग अपनी दृष्टि को पूरी से खो देने से बच सकते हैं। इसके तीन उपचार हैं, जैसे- लेजर सर्जरी आंखों में ट्रायमसिनोलोन का इंजेक्शन तथा विट्रेक्टोमी, ये तीनों ही उपचार सफल साबित हुए हैं, लेकिन आज भी दुनिया भर में लेजर सर्जरी ही इस रोग का एकमात्र स्थायी इलाज है।

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धूम्रपान से परहेज कर तथा हाईपरटेंशन को नियंत्रण में रखते हुए भी इस रोग को हमले से बचा जा सकता है। अगर एक बार दृष्टि खो जाए तो उसे वापस नहीं लौटाया जा सकती। यदि आपकी दृष्टि 6/6 हो तब भी आप डायबिटिक रेटिनोपैथी का शिकार बन सकते हैं। ऐसे में आपके पास लेजर उपचार के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं रह जायेगा।

डायबिटिक रेटीनोपैथी के बारे में तथ्य :
भारत मधुमेह की विश्व राजधानी है।
भारत में 4 करोड़ मधुमेह के मरीज हैं।
डायबिटिक रेटीनोपैथी खामोशी से नजरों पर हमला करती है। मरीजों को अक्सर तब मालूम चलता है जब बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है। इसलिए अपने नेत्र विशेषज्ञ से नियमित तौर पर जांच कराएं। एक बार दृष्टि खो जाने पर उपचार द्वारा उसे लौटा लाना संभव नहीं है। मौजूदा दृष्टि को बचाने के लिए ही उपचार किया जाता है। दुनिया में लेजर ही इसका एकमात्र स्थायी इलाज है। चाहे आपकी दृष्टि 6/6 हो तो भी आपको डायबिटिक रेटीनोपैथी हो सकती है और आपको लेकर उपचार की आवश्यकता पड़ सकती है। धूम्रपान न करना, अच्छी शूगर का सेवन करना, रकतचाप एवं कॉलेस्ट्राल पर नियंत्रण रखना, इन तरीकों से डायबिटीज संबंधित दृष्टिहीनता से बचा जा सकता है।

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